सुनो न , तुमको कभी मेरी याद आती है क्या ? याद छोड़ो, क्या कभी तुमने मेरा ज़िक्र भी है किया ? क्या तुम्हें कभी हिचकी नहीं आती ? क्या तुम्हारे निष्ठुर मन के दरवाज़े पर , हमारे हसीन पलों की दस्तक सुनाई नहीं देती? तुम्हारा हिस्सा तो नहीं बनना था मुझे पर क्या तुम्हारे किसी किस्से में भी "मैं " नहीं ? चाहत तो तुमने भी हमसे कभी की थी अथाह, पर न जाने लगी हाय हमें किसकी नज़र इतने सालों में न तुमने कभी किया कोई फ़ोन न ही ली कोई खोज खबर।
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Showing posts from February, 2021
Badhti Umra ka dard
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ऐ उम्र रूपी वृक्ष , तुझे बढ़ने की इतनी जल्दी क्या है ? देख न मेरी ओर ध्यान से देख , श्याम बालों को तू श्वेत करने लगा है , सच कह रही हूँ , तू मुझे बहुत ठगने लगा है। चेहरे पर अब वो ताज़गी नज़र नहीं आती , अजीब सी लकीरें देती हैं दिखाई। शरीर के अंग भी कुछ होने लगे हैं ढीले , जिसे देख अपने हो जाते हैं लाल - पीले।। कुछ - करो कुछ - करो का सुनना पड़ता है ताना , क्या बताऊँ जीवन का बदल गया है अफ़साना।। बता ना तू , कुछ तो बोल , क्या तुझे बढ़ना ज़रुरी है , क्यों नहीं बन सकती मैं पहले जैसी , अल्लढ़ सी - नादान सी। कभी थोड़ी खुश तो कभी थोड़ी परेशान सी ।। क्या तू कोई जादू कर सकता है ? क्या मुझे फिर से पहले जैसा कर सकता है ? फिर से बना दे ना मुझे बच्चा , फिर सब कुछ हो जायेगा अच्छा। तुझे बढ़ते देख मुझे डर सा लगता है , दिल...
News paper
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ऐ प्यारे न्यूज़ पेपर , ज़रा मुझे एक बात तो बता ! तुझे अपनी खबरें पढ़कर बेचैनी होती है क्या ? मेरी तरह तुझे भी परेशानी होती है क्या ? कहते हैं सभी, तुझे पढ़कर हमें दुनिया की खबरें मिल जाती हैं| पर न जाने मेरे साथ ऐसा क्यों होता है ? तुझसे मिलकर मेरा दिल रोता है| जब भी तुझे विस्तार से पढ़ती हूँ , मैं पूरी तरह हिल जाती हूँ ज्ञान का वर्धन तो नहीं होता मेरा , आत्मचिंतन में पड़ जाती हूँ। ये सोच के मेरा दिल काँप जाता है , हम मानव नहीं दानव बन गए हैं। चारों और विध्वंस की ध्वनि सुनाई देती है , हर चेहरे में बेचारगी दिखाई देती है। काश कुछ चमत्कार हो जाता , तेरे हर पन्ने पर खुशियों का रंग भर जाता हर खबर में कुछ सकारात्मक बात नज़र आती, मार काट का अंश मिट जाता।
Maa ki Vyathaa
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क्या करूँ कुछ समझ नहीं आ रहा , आखिर कुच्चू मेरी बात सुनता क्यों नहीं! मैंने कहाँ कमी कर दी , क्या गलती हो गई मुझसे ? मैंने तो तुझे पहले ही कहा था एक बच्चा ज़िद्दी होता है , कम से कम दो बच्चे तो होने ही चाहिए। रीति और उसकी माँ में रोज़ इस बात पर बहस हो ही जाती थी। "माँ आपके पास बात करने के लिए और कोई विषय नहीं होता, कुछ और कहना है तो कहिए नहीं तो मैं फ़ोन रखती हूँ। " फ़ोन रखने के बाद रीति अपने आपमें ही खो सी गई थी| दरवाज़े पे आहट से उसका ध्यान टूटा। देखा तो दरवाज़े पर रोहन खड़ा था, माँ मैं कब से आपको आवाज़ लगा रहा था| कहाँ थे आप? यहीं थी कुच्चू , तेरी नानी का फ़ोन आया था| अच्छा, जो सामान मंगाया था ले आये? "हाँ, ले आया" कहते हुए रोहन किचन में सामान रखने चला गया| चलो हाथ मुँह धो लो और पढ़ने बैठ जाना। क्या माँ जब देखो पढ़ने को कहती रहती हो ? मुझे अभी टीवी देखना है, मैं एक घंटे बाद पढूंगा। इसी बात पर माँ - बेटे में बहस हो जाती है और ज़ोर से आवाज़ आती है "चटैक " "चटैक" | रोहन रोते हुए कमरे से बाहर निकल जाता है और बुदबुदाता है कि आपको औ...
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रचना और उसका १२ साल का बेटा नमन बाज़ार से घर लौट रहे थे| इतवार का दिन था तो दोनों बाजार घूमने गए थे| आते-आते देर हो गयी थी | घर के अंदर आते समय नमन की नज़र दीवार पर लिखे नाम पर पड़ी | कुछ देर वो एकटक देखता रहा, जैसे ही निगाह हटी उसने देखा की माँ तो अंदर जा चुकी हैं | माँ ने आवाज़ लगायी "पुचकू " ओ "पुचकू" हाथ मुँह धो लो बेटा| नमन ने कोई उत्तर नहीं दिया | न जाने वो किस सोच में डूबा हुआ था ? कुछ समय पश्चात जब रचना को बेटे की आवाज़ नहीं आयी तो वो कमरे में गयी जहाँ नमन पलंग पर लेते हुए कुछ लिख रहा था | नमन को डायरी लिखने का शौख था | जब भी उसके मन में कोई बात आती तो चला जाता था अपने दोस्त से अपनी बातें कहने| बेटा क्या कर रहे हो ? कब से बुला रही हूँ तुझको| माँ माफ़ करना आपकी आवाज़ सुनाई नहीं दी| मैं कुछ लिख रहा था| माँ ने कहा दिखा तो क्या लिखा है आज तूने ? जब मैं पूरा लिख लूँगा तब दिखाऊंगा| रात हो चुकी थी नमन सोने चला गया था| घर का काम कर जब रचना कमरे में आयी तो उसने देखा नमन की डायरी उसके पास ही र...
Aatmachintan
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अपने अंदर की हलचल से , सवालों के तूफ़ान से किसी को वाकिफ़ कराऊँ, तो कैसे कराऊँ ? कौन है जो मुझे सुन पाएगा , मेरी उलझन को समझ पाएगा उपहास से लगता है डर , जो मसला करता है मुझे परेशान क्या पता उनके लिए हो , एक छोटी सी खबर नहीं समझ आता मुझे, इस ज़माने का चलन कितने भी बड़े गुनाह हो, पैसे की ताकत से हो जाते हैं हर गुनाह दफ़न चाहे हो आरुषि/हेमराज हत्याकांड, या सितारों का यों ही चले जाना सोचती हूँ कर ही क्या कर सकते हैं ? हमारे देश का क़ानून ही अँधा है गुनेहगार जीते हैं चैन से , पड़ता निर्दोशों के गले में फंदा है | प्रीति मिश्रा
Man ki baat "Khud se"
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"आलस्य की जंजीर को तोड़ मैं मनचली, चली अपनी कल्पना की गली " बहुत दिनों से तलाश रही थी एक कोना जो सिर्फ मेरा हो, जहाँ मैं थोड़ा समय अपने साथ व्यतीत कर सकूँ। सात-आठ साल एक लम्बा समय होता है, कुछ न करने की आदत ने ऐसा जकड़ लिया है कि क्या बताऊँ? बड़ा मुश्किल है आलस्य को त्याग कर फिर से कुछ करना। मगर अब मन करता है की फिर से कुछ लिखूं, फिर से कुछ सोचूं। न जाने ऐसा कितने दिन कर पाउंगी लेकिन फिर से प्रयास करना चाहती हूँ। अपने आप को एक मौका देना चाहती हूँ।