Man ki baat "Khud se"
"आलस्य की जंजीर को तोड़ मैं मनचली, चली अपनी कल्पना की गली "
बहुत दिनों से तलाश रही थी एक कोना जो सिर्फ मेरा हो, जहाँ मैं थोड़ा समय अपने साथ व्यतीत कर सकूँ।
सात-आठ साल एक लम्बा समय होता है, कुछ न करने की आदत ने ऐसा जकड़ लिया है कि क्या बताऊँ?
बड़ा मुश्किल है आलस्य को त्याग कर फिर से कुछ करना। मगर अब मन करता है की फिर से कुछ लिखूं,
फिर से कुछ सोचूं। न जाने ऐसा कितने दिन कर पाउंगी लेकिन फिर से प्रयास करना चाहती हूँ।
अपने आप को एक मौका देना चाहती हूँ।

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