सुनो न , तुमको कभी मेरी याद आती है क्या ?
याद छोड़ो, क्या कभी तुमने मेरा ज़िक्र भी है किया ?
क्या तुम्हें कभी हिचकी नहीं आती ?
क्या तुम्हारे निष्ठुर मन के दरवाज़े पर ,
हमारे हसीन पलों की दस्तक सुनाई नहीं देती?
तुम्हारा हिस्सा तो नहीं बनना था मुझे पर
क्या तुम्हारे किसी किस्से में भी "मैं " नहीं ?
चाहत तो तुमने भी हमसे कभी की थी अथाह,
पर न जाने लगी हाय हमें किसकी नज़र
इतने सालों में न तुमने कभी किया कोई फ़ोन
न ही ली कोई खोज खबर।
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