Aatmachintan
अपने अंदर की हलचल से , सवालों के तूफ़ान से
किसी को वाकिफ़ कराऊँ, तो कैसे कराऊँ ?
कौन है जो मुझे सुन पाएगा , मेरी उलझन को समझ पाएगा
उपहास से लगता है डर , जो मसला करता है मुझे परेशान
क्या पता उनके लिए हो , एक छोटी सी खबर
नहीं समझ आता मुझे, इस ज़माने का चलन
कितने भी बड़े गुनाह हो, पैसे की ताकत से
हो जाते हैं हर गुनाह दफ़न
चाहे हो आरुषि/हेमराज हत्याकांड, या सितारों का यों ही चले जाना
सोचती हूँ कर ही क्या कर सकते हैं ? हमारे देश का क़ानून ही अँधा है
गुनेहगार जीते हैं चैन से , पड़ता निर्दोशों के गले में फंदा है |
प्रीति मिश्रा
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