Badhti Umra ka dard

  उम्र रूपी वृक्ष , तुझे बढ़ने की इतनी जल्दी क्या है ?

देख मेरी ओर  ध्यान से देख, श्याम बालों को तू  श्वेत करने लगा है ,

सच कह रही हूँ , तू मुझे बहुत ठगने लगा है।  

 

चेहरे पर अब वो ताज़गी नज़र नहीं आती , अजीब सी लकीरें देती हैं दिखाई।

शरीर के अंग भी कुछ होने लगे हैं ढीले, जिसे देख अपने हो जाते हैं लाल-पीले।। 

कुछ -करो कुछ -करो का सुनना पड़ता है ताना , क्या बताऊँ जीवन का बदल  गया है अफ़साना।।

 

बता ना तू , कुछ तो बोल , क्या तुझे बढ़ना ज़रुरी है ,

क्यों नहीं बन सकती मैं पहले जैसी ,अल्लढ़ सी - नादान सी।

 कभी थोड़ी खुश तो कभी थोड़ी परेशान सी ।। 

 

क्या तू कोई जादू  कर सकता है ? क्या मुझे फिर से पहले जैसा कर सकता है ?

फिर से बना दे ना मुझे बच्चा , फिर सब कुछ हो जायेगा अच्छा। 

तुझे बढ़ते देख मुझे डर सा लगता है , दिल में रोज़ कुछ रिसता है। 

 

जितना मैं बढूँगी , माँ - पापा भी तो बढ़ते जायेंगे ,

बता क्या हम सदा एक साथ रह पाएंगे ?

जो जैसे हैं उनको रहने दो वैसे ही

दूँगी मैं तुम्हें खूब दुआएं , तुमको हमारी उमर लग जाए।।

 


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