रचना और उसका १२ साल का बेटा नमन बाज़ार से घर लौट रहे थे| इतवार का दिन था तो दोनों बाजार घूमने गए थे| आते-आते देर हो गयी थी | घर के अंदर आते समय नमन की नज़र दीवार पर लिखे नाम पर पड़ी | कुछ देर वो एकटक देखता रहा, जैसे ही निगाह हटी उसने देखा की माँ तो अंदर जा चुकी हैं | माँ ने आवाज़ लगायी "पुचकू " ओ "पुचकू" हाथ मुँह धो लो बेटा| नमन ने कोई उत्तर नहीं दिया | न जाने वो किस सोच में डूबा हुआ था ? कुछ समय पश्चात जब रचना को बेटे की आवाज़ नहीं आयी तो वो कमरे में गयी जहाँ नमन पलंग पर लेते हुए कुछ लिख रहा था | नमन को डायरी लिखने का शौख था | जब भी उसके मन में कोई बात आती तो चला जाता था अपने दोस्त से अपनी बातें कहने|
बेटा क्या कर रहे हो ? कब से बुला रही हूँ तुझको| माँ माफ़ करना आपकी आवाज़ सुनाई नहीं दी| मैं कुछ लिख रहा था| माँ ने कहा दिखा तो क्या लिखा है आज तूने ? जब मैं पूरा लिख लूँगा तब दिखाऊंगा| रात हो चुकी थी नमन सोने चला गया था| घर का काम कर जब रचना कमरे में आयी तो उसने देखा नमन की डायरी उसके पास ही रखी थी | जब उसने पन्ने को पलटा तो देखा उसने अपने पापा को कुछ लिखा है |
प्यारे पापा!
आज जब घर के अंदर आ रहा था तो दीवार पर दादा जी का नाम लिखा हुआ देखा| थोड़ी धूल ल चढ़ी हुई थी | मुझे याद है आप बताया करते थे की दादा जी को अपना नाम बहुत पसंद था | हमेशा आपसे कहा करते थे की अपने खानदान का नाम रौशन करना, अपना नाम ऊंचा करना और आपने ऐसा किया भी | आपने हर क्षेत्र में नाम कमाया , चाहे स्कूल हो, कॉलेज या फिर आपका कार्यक्षेत्र!
पापा जब मैंने दादा जी के नेमप्लेट पर धूल लगा देखा तो ऐसे ही मेरे मन में कुछ ख़्याल आया जो मैं आपके साथ बांटना चाहता हूँ |
"जिस नाम को कमाने के लिए हम सब करते हैं इतनी मेहनत , दिन रात एक कर देते हैं। एक दिन वही नाम सदा के लिए दीवार पर छप जाता है, रह जाती हैं उस नाम से जुड़ी बातें। कुछ अच्छी ,कुछ बुरी कुछ खट्टी, कुछ मीठी।"
पापा मैं भी आपकी तरह अपना नाम रोशन करना चाहता हूँ लेकिन मैं सिर्फ एक याद बनकर नहीं रह जाना चाहता। जिस तरह नाम कमाते कमाते आप याद बन कर रह गए।
आपका नमन !
रचना ने डायरी बंद की और नमन के पापा की फोटो की और देखा। नम आँखों से बोली कितना बड़ा हो गया है हमारा बेटा।
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